बागनाथ मंदिर, Bageshwar


निलेश्वर भिलेश्वर पहाडियो के बीच पवित् सरयू गोमती के संगम पर बसा बागेश्वर जिला जो उत्तर की काशी के नाम से भी जाना जाता है, इस जिले का प्रसिद्ध बाबा बागनाथ का मंदिर जो कि भगवान शिव को समर्पित है! बागनाथ मंदिर एक प्राचीन मंदिर है।इस मंदिर की नक्काशी प्रभाबशाली है। इसी के साथ यह बागेश्वर जिले का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है ! यह भूमि मार्केंडेय ऋषि की तपोभूमि के नाम से भी जानी जाती है। भगवान शिव के बाघ रूप में इस स्थान में निवास करने से इसे “व्याघ्रेश्वर” नाम से जाना गया | जो बाद में बागेश्वर हो गया ! यहां पर अनेको मंदिर विराजमान है ,जिसमे मंदिर के नजदीक स्थित बाणेश्वर मंदिर वास्तु कला की दृष्टि से बागनाथ मंदिर के समकालीन लगता है। मंदिर के समीप ही भैरवनाथ का मंदिर बना है। बाबा काल भैरव मंदिर में द्वारपाल रूप में निवास करते हैं। मंदिर के इतिहास के बारे मे लोगो का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण चन्द वंश के शासको ने किया, जिसमे राजा लक्ष्मी चंद जी का नाम आता है,
पौराणिक मान्यताओ के अनुसार :
पुराण के अनुसार अनादिकाल में राजा भगीरथ अपने कठोर तपबल से ब्रह्मा के कमंडल से निकली मां सरयू को ला रहे थे ताकी पावन सरयू के जल से भगीरथ के पूर्वजो का उद्धार हो सके, जब भगीरथ यहां पहुचे तब उन्होने देखा कि, यहां ब्रह्मकपाली के समीप ऋषि मार्कण्डेय तपस्या में लीन थे।
भगीरथ जी को उनकी तपस्या के भंग होने का खतरा सताने लगा। देखते देखते वहां जल भराव होने लगा। सरयू आगे नहीं बढ़ सकी। उन्होंने शिवजी की आराधना की।तब शिवजी ने बाघ का रूप रख कर पार्वती को गाय बना दिया और ब्रह्मकपाली के समीप गाय पर झपटने का प्रयास किया। गाय के रंभाने से मार्कण्डेय मुनि की आंखें खुल गई। व्याघ्र (बाघ )से गाय को मुक्त करने के लिए जैसे ही दौड़े तो व्याघ्र ने शिव और गाय ने पार्वती का रूप धारण कर मार्कण्डेय को दर्शन देकर इच्छित वर दिया और राजा भगीरथ को आशीर्वाद दिया और इस प्रकार मां गंगा (सरयू) पृथ्वी पर अवतरित हुई और शिव जी के व्याघ्र (बाघ ) रूप के कारण यहां का नाम “व्याघ्रेश्वर” पडा जो समय के साथ बदलकर बागेश्वर हो गया .
एक अन्य किवदंती यह है कि भक्तों ने मंदिर में एक शिवलिंग स्थापित करने का फैसला किया लेकिन शिवलिंग स्थापित करने के प्रयास हर बार असफल हो जाते थे, कोई भी मंदिर में शिवलिंग स्थापित नहीं कर सकता था ,लेकिन श्री मनोरथ पांडे जो कि एक स्थानीय निवासी थे , उनकी तपस्या से महा शिवरात्रि के दिन मूर्ति को सफलतापूर्वक स्थापित किया गया । भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ‘श्रावण’ के पवित्र माह मे विशेष रूप से महा शिवरात्री पर और हर सोमवार को बागनाथ मंदिर में भक्तों की एक बड़ी संख्या लगी रहती है |

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